Friday, October 17, 2008

पेट में घास नही, सिंग में तेल


पेट में घास नही, सिंग में तेल. १५ अक्टूबर को मनाया गया अन्तेर्राष्ट्रीय हाथ धुलाई दिवस के अव्षर पर कुछ ऐसा ही देखने को मिला. विद्यालयों में समारोह आयोजित कर बच्चों को स्वक्षता और उससे होने वाली लाभ हानी के बारे में बताया गया. साफ व् स्वक्ष रहना जरूरी है. परंतु इससे उन्हें क्या लेना देना जिनके पास दोनों वक्त का भोजन करने की कोई वयवस्था नही कोई. एक रोटी के टुकरे को बच्चों में बाटकर जीवन गुजर बसर करने वाले को हाथ साबुन से धोने के लिए पैसा कहाँ से आएगा शयद इस
ओर अन्तेर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान नही गया. संयुक्त राष्ट्र संघ के विश्व खादयान्न दिवश पर जरी एक रिपोर्ट में कहा गया बिकश्स्शील देशो में ९० करोर से अधिक लोग भुखमरी झेल रहे है. गरीबो के लिए बनाई गई लाल कार्ड, पिला कार्ड, अन्नपूर्णा, अन्तोयोदय योजना आज गरीबो के काम न आकर बाबू के काम आ रही है. विद्यालयों में चल रही पोषाहार योजना से शिक्षक पुष्ट हो रहे है. छात्रों को सारा गला चावल का खिचरी परोशा जा रहा है. कहा रहती है उस वक्त स्वक्षता अभियान. कागज पर एन जी औ दुवारा पंचयत को स्वक्ष बनाकर रिपोर्ट प्रस्तुत कर सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है. हाथ धुलाई दिवस पर स्कूलों में बछो का हाथ तो धोया गया पर उसके बाद फिर वाही गन्दा भोजन व् गन्दा हाथ. और फिर उनका किया होगा जिनके पास भोजन का कोई उपाय नही है. ऐसे में सरकारी योजना सिर्फ समारोह तक ही सिमट कर रह जाती है.

2 comments:

sant paramjit singh said...
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परमजीत सिहँ बाली said...

sach hai in samaroh kaa unhe koi laaBha nahi hone vaalaa.